नई दिल्ली. भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत हिट-and-run मामलों से जुड़ी विशेष धारा लागू होने का इंतजार अब भी बना हुआ है। कानून बने हुए 2 साल का समय बीत जाने के बाद भी यह विशिष्ट प्रावधान पूरी तरह से जमीन पर प्रभावी नहीं हो पाया है, जिसके चलते आपराधिक न्याय प्रणाली में कई तरह की व्यावहारिक परेशानियां सामने आ रही हैं।
हाल ही में सामने आए सड़क हादसों और आपराधिक मामलों के कारण पुलिस और जांच एजेंसियों को मजबूरन अन्य वैकल्पिक धाराओं का सहारा लेना पड़ रहा है। कानूनी जानकारों और वकीलों का मानना है कि इस व्यवस्था के धरातल पर न उतरने से अदालतों में मुकदमों के दौरान गलत आरोप तय होने का गंभीर जोखिम पैदा हो गया है, जिससे न्याय मिलने में भी अनावश्यक देरी हो रही है।
मुख्य बातें
- भारतीय न्याय संहिता के तहत हिट-and-run से जुड़ा विशिष्ट प्रावधान अभी तक अमल में नहीं लाया जा सका है।
- कानून लागू होने में हो रही इस देरी के कारण पुलिस अधिकारियों को हालिया मामलों में अलग-अलग धाराओं के तहत कार्रवाई करनी पड़ रही है।
- कानूनी विशेषज्ञों और वकीलों ने चेतावनी दी है कि इस अंतर के चलते मामलों में गलत आरोप तय होने और कानूनी जवाबदेही तय होने में रुकावट आ सकती है।
- इस तकनीकी और प्रशासनिक अंतराल के कारण सड़क हादसों के पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया धीमी होने की आशंका जताई जा रही है।
कानूनी पेचीदगियां और पुलिस की मजबूरी
विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक इस तरह के गंभीर मामलों के लिए निर्धारित नए कानूनी प्रावधान आधिकारिक रूप से लागू नहीं होते, तब तक पुलिस को उपलब्ध मौजूदा और सामान्य धाराओं के आधार पर ही मुकदमे दर्ज करने पड़ते हैं। इससे न केवल जांच की दिशा प्रभावित होती है, बल्कि अदालती सुनवाई के दौरान वकीलों को भी मुकदमों की पैरवी में अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वकीलों का तर्क है कि सही और सटीक कानूनी धारा के अभाव में दोषियों पर शिकंजा कसना कमजोर पड़ सकता है।
आगे की राह और प्रशासनिक कदम
सड़क हादसों और लापरवाही से गाड़ी चलाने के मामलों में बढ़ती चिंताओं के बीच यह मांग जोर पकड़ रही है कि संबंधित प्रावधानों को जल्द से जल्द पूरी तरह लागू किया जाए। हालांकि, सरकार और संबंधित महकमों की ओर से इस धारा को धरातल पर उतारने की निश्चित समयसीमा को लेकर अभी आधिकारिक घोषणा होना बाकी है।








